देशभर की जिला और तहसील अदालतों में महिला वकीलों के लिए शौचालय और अन्य बुनियादी सुविधाओं की कमी पर सुप्रीम कोर्ट ने कड़ा रुख अपनाया है। मुख्य न्यायाधीश की अध्यक्षता वाली पीठ ने इसे मानवाधिकारों से जुड़ा गंभीर मुद्दा बताते हुए सभी राज्य सरकारों को छह सप्ताह के भीतर आवश्यक कदम उठाने का निर्देश दिया है।
सुनवाई के दौरान अदालत ने कहा कि महिला वकीलों को सुरक्षित, सम्मानजनक और सुविधाजनक कार्यस्थल उपलब्ध कराना न्याय व्यवस्था की प्राथमिक जिम्मेदारी है। मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत ने कहा, “हमारी बेटियां जर्जर इमारतों में और दयनीय स्थितियों में काम कर रही हैं. इस स्थिति में बदलाव हमारी सर्वोच्च प्राथमिकता है. महिलाओं के लिए बुनियादी सुविधाएं न होना उनके आत्मसम्मान और काम करने की क्षमता को प्रभावित करता है.”
महिला वकीलों की याचिका पर सुनवाई
सुप्रीम कोर्ट का यह आदेश देशभर की अदालतों में महिला वकीलों के लिए बुनियादी सुविधाओं की मांग को लेकर दायर याचिका पर आया है। याचिका में हर अदालत परिसर में ‘लेडीज बार रूम’ की स्थापना और युवा वकीलों की आर्थिक सहायता के लिए ‘यंग लॉयर्स प्रोफेशनल असिस्टेंस फंड’ बनाने की मांग की गई है।
यह याचिका सारिका त्यागी, सीमा वशिष्ठ समेत छह महिला वकीलों की ओर से दायर की गई थी। इस मामले में सुप्रीम कोर्ट ने 19 जून को नोटिस जारी किया था और शुक्रवार (17 जुलाई) को पहली बार विस्तृत सुनवाई हुई। केंद्र सरकार की ओर से पेश अटॉर्नी जनरल आर. वेंकटरमणी ने अदालत को बताया कि वह याचिका में उठाए गए मुद्दों पर सभी राज्यों के एडवोकेट जनरल से चर्चा करेंगे।
दो सप्ताह में रिपोर्ट, चार सप्ताह में काम शुरू करने का निर्देश
सुप्रीम कोर्ट ने सभी राज्यों के एडवोकेट जनरल को निर्देश दिया है कि वे दो सप्ताह के भीतर अपने-अपने राज्यों की अदालतों में स्वच्छता और बुनियादी सुविधाओं की वास्तविक स्थिति पर रिपोर्ट तैयार कर राज्य सरकार को सौंपें। इसके आधार पर लोक निर्माण विभाग (PWD) को अगले चार सप्ताह के भीतर शौचालय और अन्य आवश्यक सुविधाओं के निर्माण का काम शुरू करना होगा।
‘बजट की कमी का बहाना नहीं चलेगा’
सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट किया कि इस मामले में धन या बजट की कमी का कोई बहाना स्वीकार नहीं किया जाएगा। अदालत ने कहा कि यदि आवश्यक हो तो राज्य सरकारें संसाधन जुटाने के लिए शराब और सिगरेट पर अतिरिक्त कर लगा सकती हैं। अदालत ने यह भी कहा कि ऐसे कदम को कानूनी मान्यता देने में कोई बाधा नहीं होगी।















