उत्तर प्रदेश में 2027 के विधानसभा चुनावों (UP Election 2027) से पहले ‘वोट बैंक’ की सियासत अपने चरम पर है। समाजवादी पार्टी (सपा) द्वारा बहुजन नायक कांशीराम की जयंती को ‘PDA दिवस’ (पिछड़ा, दलित, अल्पसंख्यक) के रूप में मनाने के ऐलान के बाद सपा और बसपा के बीच जुबानी जंग तेज हो गई है। बसपा सुप्रीमो मायावती द्वारा इसे ‘विशुद्ध राजनीतिक नाटकबाजी’ बताए जाने के बाद अब सपा प्रमुख अखिलेश यादव ने बेहद सधा हुआ लेकिन करारा पलटवार किया है।
अखिलेश यादव का पलटवार: ‘लिखने और लिखवाने वाले अलग होते हैं’
मायावती के तीखे बयानों का जवाब देते हुए अखिलेश यादव ने बिना सीधा नाम लिए कई बड़े राजनीतिक संदेश दिए:
- सम्मान और सहानुभूति: अखिलेश ने कहा, “हम जिन बड़ों का सम्मान करते हैं, उनसे सहानुभूति भी रखते हैं। हम अपने बड़ों और संबंधों को हमेशा मन से निभाते हैं।”
- परोक्ष तंज: मायावती के सोशल मीडिया पोस्ट्स की तरफ इशारा करते हुए उन्होंने कहा कि जरूरी नहीं कि जो लिखा गया है, वही उनकी भावना भी हो। कई बार “लिखने वाले और लिखवाने वाले अलग होते हैं।”
- PDA की नई परिभाषा: अखिलेश ने अपनी ‘सामाजिक न्याय’ की राजनीति को धार देते हुए नया नारा दिया— “जो पीड़ित है, दुखी और वंचित है, वही असल में PDA है।”
मायावती ने क्यों बताया था इसे ‘नाटकबाजी’?
इससे पहले बसपा प्रमुख मायावती ने सपा के इस ‘PDA दिवस’ प्लान पर जोरदार हमला बोला था।
- दलित विरोधी होने का आरोप: मायावती ने सपा का चाल, चरित्र और चेहरा हमेशा से दलितों और बहुजन समाज के खिलाफ बताया।
- गेस्ट हाउस कांड की याद: उन्होंने 1993 के सपा-बसपा गठबंधन और 2 जून 1995 के कुख्यात ‘लखनऊ गेस्ट हाउस कांड’ की याद दिलाते हुए सपा पर गंभीर सवाल खड़े किए।
- सम्मान पर सवाल: मायावती ने पूछा कि जब कांशीराम जी जीवित थे, तब सपा ने उन्हें यह सम्मान क्यों नहीं दिया? और उनके निधन पर तत्कालीन सपा सरकार ने ‘राजकीय शोक’ क्यों घोषित नहीं किया था?
क्या है सपा का 2027 मास्टरप्लान?
सपा इस साल कांशीराम जयंती पर यूपी के हर जिले में बड़े कार्यक्रम आयोजित करने जा रही है। इसका मुख्य उद्देश्य ‘पीडीए’ वर्ग को एकजुट कर 2027 के विधानसभा चुनावों के लिए एक मजबूत सामाजिक और सियासी जमीन तैयार करना है।














