बांग्लादेश की राजनीति में एक नए युग की शुरुआत होने जा रही है. आम चुनाव 2026 में बांग्लादेश नेशनलिस्ट पार्टी (BNP) की बंपर जीत के बाद अब तारिक रहमान (Tariq Rahman) देश के अगले प्रधानमंत्री बनने की दहलीज पर हैं. 17 साल तक लंदन में निर्वासन (Exile) काटने के बाद उनकी वतन वापसी ने सबको चौंका दिया है. खबर है कि वह 14 फरवरी (शनिवार) को प्रधानमंत्री पद की शपथ ले सकते हैं. भारत के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने भी उन्हें जीत की बधाई दी है.
राजनीतिक गलियारों में ‘डार्क प्रिंस’ के नाम से मशहूर तारिक रहमान आखिर कौन हैं और उनकी वो 5 बड़ी ताकतें क्या हैं, जिन्होंने उन्हें देश का सबसे शक्तिशाली नेता बना दिया? आइए जानते हैं.
1. विरासत का ‘प्रिंस’, राजनीति का खिलाड़ी
तारिक रहमान का जन्म ही सत्ता के गलियारों में हुआ. वह बांग्लादेश के पूर्व राष्ट्रपति जिया उर रहमान और पूर्व प्रधानमंत्री खालिदा जिया के बड़े बेटे हैं. 1967 में जन्मे रहमान ने अपने परिवार की इस भारी-भरकम राजनीतिक विरासत को बोझ नहीं, बल्कि ताकत बनाया. उन्होंने बहुत कम उम्र में ही पार्टी के भीतर अपनी पैठ जमा ली थी.
2. ‘रिमोट कंट्रोल’ से चलाई पार्टी
2008 में जब शेख हसीना सत्ता में आईं, तो रहमान को देश छोड़ना पड़ा. वह लंदन चले गए और वहीं बस गए. लेकिन उनकी सबसे बड़ी ताकत यह रही कि उन्होंने 17 साल तक विदेश में रहते हुए भी अपनी पार्टी (BNP) पर पूरा कंट्रोल बनाए रखा. वह लंदन से ही पार्टी की रणनीति बनाते रहे और कार्यकर्ताओं का मनोबल टूटने नहीं दिया.
3. पर्दे के पीछे के रणनीतिकार
जब उनकी मां खालिदा जिया 2001 से 2006 तक प्रधानमंत्री थीं, तब तारिक रहमान ने सरकार में कोई पद नहीं लिया, लेकिन वह पर्दे के पीछे से सरकार और पार्टी दोनों चला रहे थे. उन्हें उस वक्त भी ‘सुपर प्राइम मिनिस्टर’ माना जाता था. उन्होंने संगठन को मजबूत करने पर फोकस किया, जिसका नतीजा 2026 की जीत में दिख रहा है.
4. भ्रष्टाचार के आरोपों से लड़ने का माद्दा
अवामी लीग के शासनकाल में उन पर भ्रष्टाचार और मनी लॉन्ड्रिंग के कई गंभीर आरोप लगे. कोर्ट ने उन्हें दोषी भी ठहराया, लेकिन तारिक और उनके समर्थकों ने इसे हमेशा ‘राजनीतिक प्रतिशोध’ बताया. इन मुकदमों और सजा के बावजूद उनका राजनीतिक कद कम नहीं हुआ, बल्कि समर्थकों की नजर में वे एक ‘योद्धा’ बनकर उभरे.
5. बिना सांसद बने पार्टी पर पकड़
तारिक रहमान की एक और खासियत यह रही कि वह लंबे समय तक संसद के सदस्य नहीं रहे, फिर भी पार्टी के सर्वेसर्वा बने रहे. 17 साल बाद वापसी करते हुए उन्होंने इस बार दो सीटों (ढाका-17 और बोगरा-6) से चुनाव लड़ा और दोनों जगह परचम लहराया. यह उनकी जमीनी पकड़ को साबित करता है.














