देशभर में रंगों के त्योहार होली को लेकर तैयारियां जोरों पर हैं। लेकिन, वृंदावन के रसिक संत पूज्य श्री हित प्रेमानंद गोविंद शरण जी महाराज (जिन्हें दुनिया प्रेमानंद महाराज के नाम से जानती है) की होली सबसे जुदा और बेहद खास होती है। महाराज जी के लिए होली केवल भौतिक रंगों से खेलने का साधारण त्योहार नहीं है, बल्कि यह विशुद्ध रूप से भक्ति और ईश्वर के प्रति प्रेम का एक महा-उत्सव है। उनका मानना है कि वसंत ऋतु की रमणीयता में केवल ‘हरि’ ही बसते हैं। हरि ही विविध रंगों से रंगते हैं और असली रंगत उसी भक्त के भीतर आती है जो भक्ति के रस को गहराई से जानता है।
राधा-कृष्ण के भाव में खेलते हैं फूलों की होली
प्रेमानंद महाराज हमेशा बाहरी रंगों के बजाय अंतरमन के प्रेम-रंग को अधिक महत्व देते हैं। उनकी पूरी होली राधा-कृष्ण की असीम प्रेम लीलाओं पर केंद्रित होती है। अक्सर महाराज जी वृंदावन के वराह घाट स्थित ‘श्री हित राधा केली कुंज’ में प्राकृतिक फूलों से होली खेलते नजर आते हैं। राधा-वल्लभ संप्रदाय की इस प्राचीन परंपरा में गुलाल या कृत्रिम रंगों का इस्तेमाल कम और फूलों की बारिश ज्यादा होती है। भक्तों के अनुसार, इस दौरान महाराज जी अपने गुरुदेव के साथ या प्रियाप्रियतम (राधा-कृष्ण) के अद्भुत भाव में पूरी तरह डूबे रहते हैं, जिससे वहां का पूरा वातावरण प्रेममय हो जाता है। पिछले साल 2025 की होली के भी कई वीडियो सोशल मीडिया पर वायरल हुए थे, जहां वे राधापिय जू के साथ रंगीली होली खेलते और भक्तों पर गुलाल बरसाकर उन्हें आशीर्वाद देते नजर आए थे।
होली पर प्रेमानंद महाराज का कड़ा और स्पष्ट संदेश
महाराज जी ने समाज को एक कड़ा संदेश देते हुए कहा है कि, “होली अनाचार नहीं, प्रेम और भक्ति का नाम है।” उन्होंने लोगों को आगाह किया है कि इस पवित्र पर्व पर शराब, मांस और अन्य व्यसनों से पूरी तरह दूर रहें। सड़क पर हुड़दंग मचाकर या बेतरतीब तरीके से होली खेलने के बजाय उन्होंने लोगों को ‘नाम-कीर्तन’ और सत्संग के रंगों में रंगने की सलाह दी है। उनके अनुसार, होली का असली अर्थ भगवान के रंग में रंग जाना है। बाहरी रंग तो एक दिन पानी से धुल जाएंगे, लेकिन ईश्वर के प्रेम का रंग जीवन भर आत्मा पर चढ़ा रहता है।
प्रह्लाद की कथा और कीर्तन से झूम उठते हैं भक्त
होली के अवसर पर जब प्रेमानंद महाराज “होली खेलत केलि कुंज में…” जैसे विशेष भजन गाते हैं या राधा नाम का संकीर्तन करते हैं, तो वहां मौजूद हर एक भक्त मस्ती में झूम उठता है। महाराज जी इस पर्व पर विशेष रूप से भक्त प्रह्लाद और होलिका की कथा सुनाते हैं, जो अच्छाई की जीत और भक्ति की अपार शक्ति का सबसे बड़ा प्रतीक है। उनका कहना है कि सच्ची होली तो वही है जो इंसान के मन के सभी विकारों को जलाकर राख कर दे और उस पर केवल भक्ति का पक्का रंग चढ़ाए। बरसाना और नंदगांव की लठमार या पारंपरिक होली से उलट, महाराज जी की होली बेहद शांत, आध्यात्मिक और मन को सुकून देने वाली होती है।
कौन हैं प्रेमानंद गोविंद शरण महाराज? 13 साल की उम्र में छोड़ा था घर
आज दुनियाभर में पूजे जाने वाले प्रेमानंद जी महाराज का जन्म उत्तर प्रदेश के कानपुर स्थित सरसौल में एक बेहद सात्विक ब्राह्मण परिवार में हुआ था। उनका बचपन का नाम अनिरुद्ध कुमार पांडे था। उनके दादा भी एक संन्यासी थे, जिसके कारण घर का माहौल हमेशा शांत और भक्तिमय रहता था। बहुत छोटी सी उम्र में ही अनिरुद्ध के मन में मानव जीवन के असली उद्देश्य को लेकर गहरे सवाल उठने लगे थे। इन्हीं सवालों के जवाब और सत्य की तलाश में वे महज 13 साल की उम्र में अपना घर-बार छोड़कर निकल पड़े।
शुरुआत में नैष्ठिक ब्रह्मचर्य की दीक्षा लेकर वे ‘आनंदस्वरूप ब्रह्मचारी’ कहलाए और बाद में संन्यास ग्रहण कर ‘स्वामी आनंदाश्रम’ के रूप में गंगा किनारे कठोर साधना की। एक बार बनारस में ध्यान करते समय श्यामाश्याम की कृपा से वे वृंदावन की ओर खिंचे चले गए। एक संत की प्रेरणा और स्वामी श्री श्रीराम शर्मा द्वारा आयोजित रास लीला में शामिल होने की इच्छा ने उनके जीवन की दिशा बदल दी। श्री नारायण दास भक्तमाली (बक्सर वाले मामाजी) के एक शिष्य की मदद से वे ट्रेन पकड़कर मथुरा आ गए। बांके बिहारी मंदिर में एक संत की सलाह पर वे श्री राधावल्लभ मंदिर पहुंचे। वहां उन्हें श्री हरिवंश नाम जपने की प्रेरणा मिली और अंततः वे राधावल्लभ संप्रदाय में दीक्षित हो गए। 10 वर्षों तक अपने सद्गुरु की कड़ी और विनम्र सेवा करने के बाद, आज वे वृंदावन में मधुकरी के पास रहकर श्री राधा रानी की अनन्य भक्ति में लीन हैं।














