देशभर के उपभोक्ता आयोगों में वर्षों से लंबित मामलों को लेकर सुप्रीम कोर्ट ने कड़ी नाराजगी जताई है। शीर्ष अदालत ने कहा कि उपभोक्ता आयोग रिटायर्ड जजों के ‘पुनर्वास केंद्र’ या ‘आरामगाह’ नहीं हैं। अदालत ने यह भी कहा कि बुनियादी ढांचे और सुविधाओं में सुधार किए जाने के बावजूद आयोगों के कामकाज का प्रदर्शन निराशाजनक बना हुआ है। सुप्रीम कोर्ट ने अब देशभर के उपभोक्ता आयोगों के कामकाज को लेकर विस्तृत रिपोर्ट मांगी है।
सुविधाएं और भत्ते मिलने के बावजूद प्रदर्शन पर सवाल
चीफ जस्टिस सूर्य कांत, जस्टिस जोयमाल्या बागची और जस्टिस वी. मोहना की बेंच ने उपभोक्ता आयोगों की कार्यप्रणाली पर गंभीर टिप्पणी की। पीठ ने कहा कि आयोगों के सदस्यों को सुविधाएं और भत्ते दिए जाने के बावजूद उनके कामकाज की स्थिति संतोषजनक नहीं है। यह स्थिति उपभोक्ता आयोगों के गठन के मूल उद्देश्य पर ही सवाल खड़े करती है।
सुप्रीम कोर्ट ने विशेष रूप से जिला स्तर के उपभोक्ता आयोगों के प्रदर्शन को चिंताजनक बताया। अदालत के मुताबिक जिला आयोग अपने यहां दाखिल होने वाले मामलों की प्रकृति और यह जांचने में भी प्रभावी नहीं हैं कि कोई मामला सुनवाई योग्य है या नहीं। इसके चलते मामलों के निपटारे की प्रक्रिया प्रभावित हो रही है और बड़ी संख्या में केस लंबे समय तक लंबित बने हुए हैं।
सुप्रीम कोर्ट ने मांगी लंबित मामलों की पूरी रिपोर्ट
अदालत ने कहा कि जिला उपभोक्ता आयोगों से लेकर राज्य उपभोक्ता आयोग और राष्ट्रीय उपभोक्ता आयोग यानी NCDRC तक मामलों की सुनवाई और उनके निपटारे की रफ्तार बेहद धीमी है। सुप्रीम कोर्ट ने यह भी संकेत दिया कि सदस्यों के वेतन और भत्तों को मामलों के निपटारे से जोड़ने पर विचार किया जा सकता है। अदालत के अनुसार ऐसा होने से मामलों के निपटारे की गति कई गुना बढ़ सकती है।
सुप्रीम कोर्ट ने NCDRC के अध्यक्ष को दो सप्ताह के भीतर विस्तृत रिपोर्ट दाखिल करने का निर्देश दिया है। रिपोर्ट में राष्ट्रीय उपभोक्ता आयोग में लंबित मामलों की कुल संख्या, मामलों के निपटारे की औसत दर, आयोग में कार्यरत सदस्यों की संख्या और मौजूदा लंबित मामलों को निपटाने में लगने वाले अनुमानित समय की जानकारी देनी होगी।
इसके साथ ही अदालत ने सभी राज्य उपभोक्ता आयोगों से भी अपने यहां लंबित मामलों का पूरा आंकड़ा उपलब्ध कराने को कहा है। इसका उद्देश्य देशभर में उपभोक्ता मामलों के निपटारे की वास्तविक स्थिति का आकलन करना है।
जिला उपभोक्ता आयोगों के 3 साल के प्रदर्शन का होगा मूल्यांकन
सुप्रीम कोर्ट ने सभी राज्य उपभोक्ता आयोगों के अध्यक्षों को अपने-अपने राज्यों में जिला उपभोक्ता आयोगों के पिछले तीन वर्षों के प्रदर्शन का मूल्यांकन करने का निर्देश दिया है। अदालत यह जानना चाहती है कि जिला स्तर पर मामलों की सुनवाई और निपटारे की स्थिति कैसी रही है और लंबित मामलों का बोझ किस स्तर तक पहुंच चुका है।
पीठ ने यह भी संकेत दिया है कि उपभोक्ता मामलों के जल्द निपटारे के लिए NCDRC में सदस्यों की संख्या बढ़ाने की संभावना पर विचार किया जा सकता है। इसके अलावा जिन क्षेत्रों में उपभोक्ता शिकायतों की संख्या ज्यादा है, वहां सर्किट बेंच स्थापित करने के विकल्प पर भी विचार किया जाएगा।
सुप्रीम कोर्ट की इस सख्ती का उद्देश्य उपभोक्ता आयोगों में लंबित मामलों का तेजी से निपटारा सुनिश्चित करना और इन आयोगों को उस उद्देश्य के अनुरूप प्रभावी बनाना है, जिसके लिए इनका गठन किया गया था।















