सुप्रीम कोर्ट ने तलाक से जुड़े एक अहम मामले में लंबे समय से अलग रह रहे एक दंपति के विवाह को समाप्त करने की मंजूरी दे दी है। अदालत ने माना कि दोनों पक्ष दिसंबर 2005 से अलग रह रहे थे और पत्नी के व्यवहार से यह स्पष्ट होता है कि उसने वैवाहिक रिश्ते को खत्म कर दिया था। शीर्ष अदालत ने मामले में पति को तलाक की डिक्री देते हुए पत्नी के लिए 7 लाख रुपये के स्थायी गुजारा भत्ते का भी आदेश दिया है।
लंबे समय से अलग रहना बना तलाक का आधार
जस्टिस प्रशांत कुमार मिश्रा और जस्टिस चंद्रशेखर की बेंच ने अपने फैसले में कहा कि वैवाहिक कानून का मूल उद्देश्य विवाह संस्था को बचाना है, लेकिन जब पति-पत्नी लंबे समय से अलग रह रहे हों और उनके बीच वैवाहिक संबंध व्यावहारिक रूप से समाप्त हो चुका हो, तो कानून को परिस्थितियों की वास्तविकता को भी स्वीकार करना पड़ता है।
बेंच ने कहा कि इस मामले में रिकॉर्ड से साफ है कि दोनों पक्ष लंबे समय से अलग-अलग रह रहे हैं। पत्नी ने अदालत के सामने यह जरूर कहा था कि वह अपने वैवाहिक दायित्व निभाने के लिए तैयार थी, लेकिन केवल बयान देना पर्याप्त नहीं है, खासकर तब जब उसका व्यवहार इसके विपरीत दिखाई देता हो। सुप्रीम कोर्ट ने अपने पूर्व के एक फैसले का हवाला देते हुए कहा कि पति-पत्नी का लंबे समय तक अलग रहना इस बात के आकलन में महत्वपूर्ण कारक है कि वैवाहिक संबंध को दोबारा बहाल किया जा सकता है या नहीं।
मध्यप्रदेश हाईकोर्ट के फैसले को पति ने दी थी चुनौती
सुप्रीम कोर्ट का यह फैसला उस अपील पर आया, जिसमें पति ने मध्यप्रदेश हाईकोर्ट के आदेश को चुनौती दी थी। हाईकोर्ट ने माना था कि पति पत्नी की ओर से क्रूरता और परित्याग को साबित करने में असफल रहा है, इसलिए उसे तलाक की डिक्री नहीं दी जा सकती।
सुप्रीम कोर्ट ने इस निष्कर्ष को सही नहीं माना। बेंच ने कहा कि ट्रायल कोर्ट के समक्ष यह तथ्य पहले ही स्थापित हो चुका था कि पति-पत्नी दिसंबर 2005 से साथ नहीं रह रहे थे। ऐसे में हाईकोर्ट का यह निष्कर्ष कि पत्नी का अपने पति को छोड़ने का इरादा नहीं था, सही नहीं था।
पत्नी ने पति को ‘अनपढ़-गंवार’ कहकर किया था अपमानित
मामले की सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट ने शादी के बाद के घटनाक्रम पर भी गौर किया। रिकॉर्ड के मुताबिक, दोनों की शादी जून 2003 में हुई थी। शादी के कुछ समय बाद ही पत्नी अपने पति की शैक्षणिक योग्यता को लेकर उससे दूरी बनाने लगी थी। यहां तक कि उसने पति को ‘अनपढ़’ और ‘गंवार’ कहकर अपमानित भी किया था।
इसके बाद महिला नवंबर 2005 में अपने मायके चली गई थी और फिर पति-पत्नी साथ नहीं रहे। पति ने जून 2007 में हिंदू विवाह अधिनियम, 1955 की धारा 13 के तहत तलाक की याचिका दाखिल की थी। इसमें पत्नी के घर छोड़कर चले जाने और मानसिक क्रूरता को तलाक का आधार बनाया गया था।
सुलह की कोशिशें भी नहीं हुईं सफल
सुप्रीम कोर्ट ने यह भी ध्यान में रखा कि पति अपनी पत्नी को वापस ससुराल ले जाने के लिए गया था, लेकिन पत्नी ने बिना किसी ठोस वजह के उसके साथ जाने से इनकार कर दिया। मामले में सुलह कराने की कई कोशिशें भी की गईं, लेकिन उनका कोई परिणाम नहीं निकला।
बेंच ने यह भी महत्वपूर्ण माना कि इस विवाह से कोई बच्चा नहीं हुआ था। अदालत ने पूरे मामले की परिस्थितियों को देखते हुए कहा कि जब दोनों पक्ष इतने लंबे समय से अलग रह रहे हों, सुलह की कोशिशें विफल हो चुकी हों और वैवाहिक रिश्ता प्रभावी रूप से समाप्त हो चुका हो, तब दोनों को जबरन उसी विवाह में बनाए रखना न्याय के उद्देश्य को पूरा नहीं करेगा।
कोर्ट ने अपने निष्कर्ष में माना कि पत्नी ने वैवाहिक रिश्ते को समाप्त कर दिया था और पति ने परित्याग के आधार को सफलतापूर्वक साबित किया है। इसी आधार पर सुप्रीम कोर्ट ने तलाक को मंजूरी दी और पत्नी को स्थायी गुजारा भत्ते के रूप में 7 लाख रुपये देने का निर्देश दिया।














