नई दिल्ली: ‘कैश कांड’ में फंसे इलाहाबाद हाई कोर्ट के जस्टिस यशवंत वर्मा को सुप्रीम कोर्ट से राहत नहीं मिली है। गुरुवार (8 जनवरी, 2026) को हुई सुनवाई में सुप्रीम कोर्ट ने उनकी याचिका पर अपना फैसला तो सुरक्षित (Reserved) रख लिया, लेकिन उन्हें जांच कमेटी के सामने पेश होने से छूट देने से साफ इनकार कर दिया।
SC ने नहीं मानी दलील, 12 जनवरी तक देना होगा जवाब
जस्टिस वर्मा के वकीलों ने कोर्ट से अनुरोध किया था कि जब तक सुप्रीम कोर्ट का फैसला नहीं आ जाता, तब तक उन्हें जांच कमेटी के सामने पेश होने से छूट दी जाए।
- कोर्ट का आदेश: जजों ने तारीखें बढ़ाने से मना कर दिया। कोर्ट ने कहा कि ये तारीखें काफी पहले तय हो चुकी थीं।
- डेडलाइन: अब जस्टिस वर्मा को 12 जनवरी तक कमेटी को लिखित जवाब देना होगा और 24 जनवरी को व्यक्तिगत रूप से पेश होना पड़ेगा।
क्या है कानूनी पेंच? (लोकसभा vs संयुक्त कमेटी)
जस्टिस वर्मा ने लोकसभा स्पीकर द्वारा बनाई गई 3 सदस्यीय जांच कमेटी (अध्यक्षता: जस्टिस अरविंद कुमार) को चुनौती दी थी।
- वर्मा का तर्क: उनके खिलाफ प्रस्ताव दोनों सदनों (लोकसभा और राज्यसभा) में पेश हुआ था, इसलिए ‘जजेस इंक्वायरी एक्ट, 1968’ के तहत संयुक्त जांच कमेटी बननी चाहिए थी। राज्यसभा के उपसभापति द्वारा नोटिस खारिज करना गलत था।
- सुप्रीम कोर्ट का सवाल: कोर्ट ने पूछा कि जब राज्यसभा ने प्रस्ताव खारिज कर दिया और लोकसभा ने स्वीकार कर लिया, तो लोकसभा की कमेटी बनाने में क्या गलत है? अंत में जज को हटाने के लिए दोनों सदनों की सहमति चाहिए होगी, तो यह आपके खिलाफ पूर्वाग्रह कैसे हुआ?
मामले की टाइमलाइन:
- 21 जुलाई: दोनों सदनों में नोटिस दिया गया।
- 11 अगस्त: राज्यसभा उपसभापति ने नोटिस खारिज किया।
- 12 अगस्त: लोकसभा स्पीकर ने जांच कमेटी गठित की।













