अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के एक बयान ने वैश्विक ऊर्जा बाजार और वित्तीय बाजारों में हलचल बढ़ा दी है। 8 जुलाई 2026 को तुर्किये की राजधानी अंकारा में आयोजित NATO समिट के दौरान ट्रंप ने कहा, “ईरान के साथ हुआ सीजफायर समझौता अब पूरी तरह खत्म हो चुका है. मैं अब ईरान से कोई डील नहीं करना चाहता.” उन्होंने यह भी कहा कि अमेरिका ने पिछली रात ईरान में कई ठिकानों पर हमले किए और खतरनाक लोगों को निशाना बनाया। इसके बाद अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की कीमतों में तेजी देखने को मिली और होर्मुज स्ट्रेट को लेकर नई चिंताएं पैदा हो गईं। ऐसे में सवाल उठ रहा है कि क्या इसका असर भारत में पेट्रोल, डीजल और CNG की कीमतों पर भी पड़ेगा।
कच्चे तेल की कीमतों में आया उछाल, भारत पर पड़ सकता है असर
ट्रंप के बयान के बाद अंतरराष्ट्रीय बाजार में ब्रेंट क्रूड की कीमत 5 प्रतिशत से अधिक बढ़कर 78 डॉलर प्रति बैरल के पार पहुंच गई, जबकि WTI क्रूड करीब 74 डॉलर प्रति बैरल तक पहुंच गया। विशेषज्ञों का मानना है कि यदि मध्य पूर्व में तनाव लंबा चलता है और होर्मुज स्ट्रेट में तेल आपूर्ति बाधित होती है, तो कच्चा तेल 85 से 90 डॉलर प्रति बैरल तक पहुंच सकता है।
भारत अपनी कुल जरूरत का लगभग 90 प्रतिशत कच्चा तेल आयात करता है। ऐसे में वैश्विक स्तर पर तेल महंगा होने का सीधा असर देश के आयात बिल पर पड़ता है। इससे पेट्रोल, डीजल, CNG के साथ-साथ परिवहन लागत बढ़ने के कारण रोजमर्रा की कई वस्तुएं भी महंगी हो सकती हैं।
शेयर बाजार में भी दिखा तनाव का असर
मध्य पूर्व में बढ़ते तनाव का असर भारतीय शेयर बाजार पर भी दिखाई दिया। सेंसेक्स में 1,600 अंकों से अधिक की गिरावट दर्ज की गई, जबकि निफ्टी 2 प्रतिशत से ज्यादा फिसल गया।
विश्लेषकों के अनुसार, इस गिरावट के पीछे निवेशकों की चिंता, कच्चे तेल की बढ़ती कीमतें और रुपये पर बढ़ता दबाव प्रमुख कारण रहे। सीनियर मार्केट एनालिस्ट तिलोकचंद गागलानी के मुताबिक, यदि होर्मुज स्ट्रेट बंद होता है तो कच्चे तेल की कीमत 85-90 डॉलर प्रति बैरल तक पहुंच सकती है। हालांकि उन्होंने यह भी कहा कि भारत ने अपनी तेल आपूर्ति के स्रोतों में विविधता लाकर और रणनीतिक भंडार तैयार करके संभावित जोखिम को काफी हद तक कम किया है।
महंगाई और आयात बिल बढ़ने की आशंका
विशेषज्ञों का मानना है कि यदि मौजूदा भू-राजनीतिक तनाव लंबे समय तक जारी रहता है, तो भारत की क्रूड इंपोर्ट बास्केट 75 डॉलर प्रति बैरल से ऊपर जा सकती है। इससे देश का आयात बिल बढ़ेगा, महंगाई पर दबाव बनेगा, करंट अकाउंट डेफिसिट प्रभावित हो सकता है और कंपनियों के मुनाफे पर भी असर पड़ सकता है।
मई 2026 में ईरान युद्ध के दौरान भारत में थोक महंगाई (WPI) फरवरी 2026 के 2.2 प्रतिशत से बढ़कर 9.7 प्रतिशत तक पहुंच गई थी। इसी अनुभव को देखते हुए विशेषज्ञ मौजूदा हालात पर भी नजर बनाए हुए हैं।
रुपये की कमजोरी से बढ़ सकती है महंगाई
जब अंतरराष्ट्रीय बाजार में तेल महंगा होता है, तब भारत को आयात के लिए अधिक डॉलर खर्च करने पड़ते हैं। इससे डॉलर की मांग बढ़ती है और रुपये पर दबाव बनता है। कमजोर रुपया विदेश से आयात होने वाले उत्पादों को महंगा बना सकता है। इसका असर इलेक्ट्रॉनिक्स, मशीनरी, शिक्षा और विदेश यात्रा जैसे कई क्षेत्रों पर पड़ सकता है।
क्या पेट्रोल, डीजल और CNG के दाम तुरंत बढ़ेंगे?
फिलहाल विशेषज्ञों का कहना है कि कीमतों में तत्काल बढ़ोतरी की संभावना नहीं है। हालांकि यदि मध्य पूर्व में तनाव लगातार बना रहता है, होर्मुज स्ट्रेट से तेल आपूर्ति प्रभावित होती है या वैश्विक LNG की कीमतें लंबे समय तक ऊंची रहती हैं, तो भारत में भी पेट्रोल, डीजल और CNG महंगे हो सकते हैं।
मई 2026 में ईरान युद्ध के दौरान सरकारी तेल कंपनियों ने पेट्रोल और डीजल की कीमत में 3 रुपये प्रति लीटर तथा CNG की कीमत में 2 रुपये प्रति किलो की बढ़ोतरी की थी। उस समय दिल्ली में CNG की कीमत 79.09 रुपये प्रति किलो, नोएडा में 80.70 रुपये, गुरुग्राम में 84.12 रुपये, अजमेर में 88.44 रुपये और मुंबई में 84 रुपये प्रति किलो तक पहुंच गई थी।
विदेश मामलों के जानकार और JNU के प्रोफेसर डॉ. राजन कुमार का कहना है कि भारत में ईंधन की कीमतें इस बात पर निर्भर करेंगी कि अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चा तेल किस स्तर पर बना रहता है। यदि क्रूड 75 से 78 डॉलर प्रति बैरल के बीच रहता है तो अगले 2 से 4 सप्ताह में कीमतों में बढ़ोतरी हो सकती है। वहीं यदि होर्मुज स्ट्रेट बाधित होता है और क्रूड 85 से 90 डॉलर प्रति बैरल तक पहुंचता है, तो ईंधन की कीमतों में और अधिक वृद्धि संभव है।
8 जुलाई 2026 की सुबह तक देश में पेट्रोल, डीजल और CNG की कीमतों में कोई बदलाव नहीं किया गया था, लेकिन अंतरराष्ट्रीय बाजार में तेल पहले ही 75 डॉलर प्रति बैरल के स्तर तक पहुंच चुका है।
भारत के पास कितना तेल भंडार है?
मौजूदा हालात को देखते हुए भारत ने तेल भंडारण क्षमता को मजबूत किया है। जून 2026 के अंत तक देश के पास कुल 104 मिलियन बैरल कच्चे तेल का भंडार मौजूद था, जिसमें रणनीतिक पेट्रोलियम भंडार (SPR), कमर्शियल स्टॉक और रिफाइनरी स्टॉक शामिल हैं।
रणनीतिक पेट्रोलियम भंडार की क्षमता 39 मिलियन बैरल है। विशाखापत्तनम, मैंगलुरु और पादुर स्थित इन भंडारों से देश की करीब 9.5 दिनों की आयात जरूरत पूरी की जा सकती है। इसके अलावा सरकारी तेल कंपनियों के पास मौजूद स्टॉक को मिलाकर भारत के पास लगभग 74 दिनों के आयात के बराबर कच्चे तेल और पेट्रोलियम उत्पादों का भंडार उपलब्ध है।
चीन की तुलना में भारत की रणनीतिक तैयारी अभी भी सीमित
हालांकि भारत ने अपने ऊर्जा सुरक्षा ढांचे को मजबूत किया है, लेकिन रणनीतिक तेल भंडारण के मामले में वह अभी भी चीन से पीछे है। इसी वजह से केंद्र सरकार ने ONGC को मैंगलुरु में 15,000 करोड़ रुपये की लागत से नया रणनीतिक तेल भंडार विकसित करने का निर्देश दिया है।
इसके अलावा चंदीखोल, बीना और बीकानेर में नए रणनीतिक भंडार विकसित करने तथा मैंगलुरु और पादुर की क्षमता बढ़ाने की योजना पर भी काम जारी है। इन परियोजनाओं के पूरा होने के बाद भारत की रणनीतिक भंडारण क्षमता बढ़कर लगभग 40 दिनों के आयात के बराबर हो जाएगी।















