कैंसर के इलाज में इस्तेमाल होने वाली महंगी दवाओं की कीमतों को नियंत्रित करने के लिए केंद्र सरकार बड़ा कदम उठाने की तैयारी में है। सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने सुप्रीम कोर्ट को बताया है कि सरकार कैंसर की दवाओं पर ट्रेड मार्जिन की अधिकतम सीमा तय करेगी। इसके लिए ऐसी दवाओं की सूची जारी की जाएगी, जिन पर यह व्यवस्था लागू होगी। इस कदम का उद्देश्य मरीजों को महंगी दवाओं से राहत दिलाना है।
सुप्रीम कोर्ट ने कहा- दूसरी दवाओं पर भी लागू हो व्यवस्था
केंद्र सरकार का पक्ष सुनने के बाद सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि दवाओं के ट्रेड मार्जिन को नियंत्रित करने की व्यवस्था केवल कैंसर की दवाओं तक सीमित नहीं रहनी चाहिए। अदालत ने दूसरी दवाओं के लिए भी इसी तरह का प्रावधान करने की जरूरत बताई।
कोर्ट ने दवाओं के अधिकतम खुदरा मूल्य (MRP) और उनकी खरीद कीमत के बीच बड़े अंतर पर चिंता जताई। अदालत के अनुसार, इस समस्या का समाधान व्यापक स्तर पर तलाशने की जरूरत है। मामले में अगली सुनवाई 27 अक्टूबर को होगी।
दवाओं की MRP और रिटेल कीमत के अंतर पर सवाल
29 सितंबर को हुई सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट ने दवाओं के अधिकतम खुदरा मूल्य (MRP) और रिटेलर को मिलने वाली कीमत (PTR) के बीच भारी अंतर पर सवाल उठाए थे। अदालत ने सुझाव दिया था कि दोनों कीमतों के बीच का अंतर 16 प्रतिशत से अधिक नहीं होना चाहिए।
कोर्ट ने यह भी सवाल किया था कि जब जरूरी दवाओं के लिए रिटेलर मार्जिन की सीमा निर्धारित है, तो दूसरी दवाओं के लिए भी ऐसी व्यवस्था क्यों नहीं लागू की जा सकती।
कैंसर की दवा की कीमत में 10 गुना अंतर पर जताई थी नाराजगी
इससे पहले 22 सितंबर को जस्टिस विक्रम नाथ और जस्टिस संदीप मेहता की पीठ ने कैंसर की एक दवा का उदाहरण दिया था। अदालत के मुताबिक, जिस दवा की कीमत रिटेलर के लिए करीब 2,700 रुपये थी, उसकी अधिकतम खुदरा कीमत 27,000 रुपये रखी गई थी।
कोर्ट ने कीमतों के इस अंतर को मरीजों के साथ “दिनदहाड़े डकैती” और “उगाही” जैसा बताया था। इस टिप्पणी के जरिए अदालत ने दवाओं की कीमत तय करने की मौजूदा व्यवस्था पर गंभीर सवाल उठाए थे।
DPCO 2013 की व्यवस्था में क्या है कमी?
सुप्रीम कोर्ट में दाखिल याचिकाओं में ड्रग्स प्राइस कंट्रोल ऑर्डर (DPCO), 2013 की मौजूदा व्यवस्था पर सवाल उठाए गए हैं। याचिकाकर्ता किशन चंद जैन और संजय कुलश्रेष्ठ का कहना है कि वर्तमान व्यवस्था के तहत निर्धारित सूची में शामिल जरूरी दवाओं यानी शेड्यूल्ड ड्रग्स की कीमतों पर ही नियंत्रण का प्रावधान है।
याचिकाकर्ताओं के मुताबिक, गैर-शेड्यूल्ड दवाओं की शुरुआती कीमतों पर सरकार का प्रभावी नियंत्रण नहीं है। उनका दावा है कि बाजार में उपलब्ध कुल दवाओं में से करीब 17 प्रतिशत ही शेड्यूल्ड ड्रग्स की श्रेणी में आती हैं। ऐसे में बाकी दवाओं की कीमतों को लेकर भी प्रभावी व्यवस्था की जरूरत बताई गई है।
सरकार ने भी माना था कीमतों में भारी अंतर का मुद्दा
29 सितंबर की सुनवाई के दौरान सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने भी माना था कि दवाओं की कीमतों में भारी अंतर होने की बात को गलत नहीं कहा जा सकता। हालांकि, उन्होंने कहा था कि इस अंतर का सीधा फायदा केवल फार्मा कंपनियों को ही मिल रहा है, ऐसा उनकी समझ में नहीं है।
उन्होंने सभी पक्षों के हितों के बीच संतुलन बनाते हुए समाधान तलाशने की जरूरत पर जोर दिया था। अब सुप्रीम कोर्ट में 27 अक्टूबर को होने वाली सुनवाई में इस मामले पर आगे की कार्यवाही होगी।















