Allahabad High Court: इलाहाबाद हाईकोर्ट ने उत्तर प्रदेश के सरकारी और निजी दोनों स्कूलों में शिक्षकों की उपस्थिति पर सख्त रुख अपनाया है। अदालत ने राज्य सरकार को आदेश दिया है कि वह ऐसा ठोस और प्रभावी तंत्र तैयार करे जिससे अध्यापक समय पर स्कूल पहुंचे और पढ़ाई प्रभावित न हो।
“आजादी के बाद से अब तक व्यवस्था नहीं बनी” — हाईकोर्ट
न्यायमूर्ति पी.के. गिरि की खंडपीठ ने कहा कि आजादी के 75 साल बाद भी राज्य सरकार शिक्षकों की नियमित उपस्थिति सुनिश्चित करने के लिए कोई मजबूत प्रणाली नहीं बना सकी है। अदालत ने कहा, “यदि शिक्षक समय पर उपस्थित नहीं होते तो बच्चों का सीखने का अधिकार प्रभावित होता है, जो संविधान द्वारा प्रदत्त शिक्षा, समानता और जीवन के अधिकार का उल्लंघन है।”
तकनीक से उपस्थिति दर्ज कराने का सुझाव
कोर्ट ने कहा कि आज के तकनीकी युग में मोबाइल ऐप, बायोमेट्रिक या डिजिटल सिस्टम से उपस्थिति दर्ज कराना बेहद आसान है। ऐसे में राज्य सरकार को तकनीक आधारित सख्त निगरानी तंत्र लागू करना चाहिए ताकि स्कूलों में शिक्षकों की लेटलतीफी पर अंकुश लग सके।
“10 मिनट की देरी मानवीय भूल, पर आदत नहीं बने”
अदालत ने यह भी स्पष्ट किया कि यदि कोई शिक्षक कभी-कभार 10 मिनट देरी से आता है, तो इसे मानवीय भूल मानकर छूट दी जा सकती है, लेकिन अगर यह नियमित आदत बन जाए तो उसे बर्दाश्त नहीं किया जाएगा।
सरकार से 10 नवंबर तक विस्तृत रिपोर्ट मांगी
सुनवाई के दौरान बताया गया कि इस मुद्दे पर राज्य के मुख्य सचिव की एक महत्वपूर्ण बैठक हो रही है। इस पर अदालत ने निर्देश दिया कि बैठक के नतीजे और सरकार द्वारा उठाए जाने वाले कदमों की विस्तृत रिपोर्ट 10 नवंबर को अगली सुनवाई में पेश की जाए।
दो अध्यापिकाओं की याचिका पर आदेश
यह आदेश अध्यापिका इंद्रा देवी और लीना सिंह चौहान की याचिकाओं पर सुनवाई के दौरान दिया गया, जिन्हें समय पर उपस्थिति दर्ज न करने पर विभागीय कार्रवाई का सामना करना पड़ा था। अदालत ने दोनों के आश्वासन पर कि भविष्य में वे समयपालन करेंगी, पहली गलती मानते हुए कार्रवाई रद्द कर दी।














