नई दिल्ली: सुप्रीम कोर्ट ने राजनीतिक दलों की पारदर्शिता बढ़ाने से जुड़ी एक अहम याचिका पर सुनवाई करते हुए चुनाव आयोग (ECI) से जवाब मांगा है। याचिकाकर्ता अश्विनी उपाध्याय ने मांग की है कि सभी राजनीतिक दलों को अपनी नियमावली (Constitution), मेमोरेंडम और रूल्स अपनी वेबसाइट पर सार्वजनिक रूप से प्रकाशित करना अनिवार्य किया जाए।
याचिकाकर्ता की दलील — “जनता को पता चलना चाहिए कि पार्टियां अपने नियमों का पालन करती हैं या नहीं”
उपाध्याय ने दलील दी कि जब तक दलों की आंतरिक कार्यप्रणाली पारदर्शी नहीं होगी, तब तक लोकतंत्र मजबूत नहीं हो सकता। उन्होंने कहा कि अगर पार्टियां अपने ही बनाए नियमों और मेमोरेंडम के मुताबिक काम नहीं करतीं, तो चुनाव आयोग को उन पर सख्त कार्रवाई करनी चाहिए।
यह आवेदन उन्होंने अपनी पहले से लंबित याचिका के तहत दाखिल किया है, जिसमें राजनीतिक दलों के रजिस्ट्रेशन और नियमन के लिए स्पष्ट नियम तय करने की मांग की गई थी।
कोर्ट ने कहा — “मांग सार्थक है, कानूनी बाधा न हो तो निर्देश जारी करेंगे”
3 नवंबर को हुई संक्षिप्त सुनवाई के दौरान जस्टिस सूर्य कांत ने उपाध्याय की मांग को ‘सार्थक’ (meaningful) बताया। उन्होंने कहा कि अगर कोई बड़ी कानूनी अड़चन नहीं आई, तो सुप्रीम कोर्ट इस मुद्दे पर स्पष्ट निर्देश जारी करेगा।
कोर्ट ने इस पर चुनाव आयोग से विस्तृत जवाब देने को कहा है।
नए आवेदन में रखी गई प्रमुख मांगें
- चुनाव आयोग यह सुनिश्चित करे कि हर राजनीतिक दल अपनी वेबसाइट के होमपेज पर अपना मेमोरेंडम, रूल्स और रेग्युलेशन प्रकाशित करे।
- आयोग यह भी सुनिश्चित करे कि दल जनप्रतिनिधित्व अधिनियम की धारा 29A का पूरी तरह पालन करें।
- चुनाव आयोग राजनीतिक पार्टियों से चंदा लेने से जुड़ी धाराओं 29B और 29C का अनुपालन करवाए, और जो पार्टियां इसका उल्लंघन करें, उनके खिलाफ कार्रवाई की जाए।
12 सितंबर की सुनवाई में क्या हुआ था
इससे पहले 12 सितंबर 2025 को मुख्य याचिका पर सुनवाई के दौरान कोर्ट ने राजनीतिक दलों के रजिस्ट्रेशन के नियमों पर चिंता जताई थी। उस समय याचिकाकर्ता ने कहा था कि कई पार्टियां चुनाव लड़े बिना ही करोड़ों रुपये का चंदा ले रही हैं और उन्हें काले धन को सफेद करने या दबाव बनाने के औजार के रूप में इस्तेमाल किया जा रहा है।
कोर्ट ने इस पर नोटिस जारी करते हुए कहा था कि इस मामले में राजनीतिक दलों को भी पक्षकार बनाया जाए, ताकि उनकी राय भी सामने आ सके।
पारदर्शिता बनाम राजनीति — बड़ा असर संभव
कानूनी जानकारों का मानना है कि अगर सुप्रीम कोर्ट इस पर सख्त निर्देश देता है, तो यह राजनीतिक दलों की वित्तीय पारदर्शिता और जवाबदेही बढ़ाने की दिशा में ऐतिहासिक कदम साबित हो सकता है। इससे उन पार्टियों पर भी लगाम लग सकती है जो सिर्फ फंड जुटाने या राजनीतिक दबाव बनाने के लिए बनाई जाती हैं।














