उत्तर प्रदेश के मेरठ जिले में कपसाड़ गांव की घटना को लेकर सियासी पारा सातवें आसमान पर पहुंच गया है। दलित युवती के अपहरण और उसकी मां की निर्मम हत्या के मामले में शनिवार (10 जनवरी, 2026) को तब नया मोड़ आ गया, जब पीड़ित परिवार को सांत्वना देने जा रहे समाजवादी पार्टी के वरिष्ठ नेता और राज्यसभा सांसद रामजीलाल सुमन को पुलिस ने रास्ते में ही रोक दिया। प्रशासन ने उन्हें और उनके साथ मौजूद सरधना विधायक अतुल प्रधान को परतापुर टोल प्लाजा पर ही रोक लिया, जिसके बाद स्थिति तनावपूर्ण हो गई।
टोल पर धक्का-मुक्की और धरना
पुलिस द्वारा काफिला रोके जाने पर सपा कार्यकर्ताओं और सुरक्षाबलों के बीच तीखी नोकझोंक और धक्का-मुक्की हुई। गांव जाने की अनुमति न मिलने से नाराज रामजीलाल सुमन और विधायक अतुल प्रधान अपने समर्थकों के साथ टोल प्लाजा पर ही धरने पर बैठ गए। सपा नेताओं ने पुलिस प्रशासन पर तानाशाही का आरोप लगाते हुए कहा कि पीड़ित परिवार की आवाज को दबाने की कोशिश की जा रही है। नेताओं ने सवाल उठाया कि घटना के दो दिन बीत जाने के बाद भी न तो आरोपी पकड़े गए हैं और न ही अपहृत युवती का कोई सुराग मिला है। विधायक अतुल प्रधान ने प्रशासन से सवाल किया कि आखिर किस वजह से पीड़ित परिवार को राजनीतिक प्रतिनिधियों से नहीं मिलने दिया जा रहा है।
क्या है कपसाड़ का खूनी संघर्ष?
गौरतलब है कि यह पूरा मामला 8 जनवरी का है, जब सरधना क्षेत्र के कपसाड़ गांव में एक दिल दहला देने वाली वारदात हुई थी। खेत पर जा रही मां-बेटी को गांव के ही कुछ दबंग युवकों ने घेर लिया था। आरोप है कि उन्होंने युवती रूबी का अपहरण कर लिया और जब मां सुनीता ने विरोध किया, तो धारदार हथियार से उन पर हमला कर दिया, जिससे इलाज के दौरान उनकी मौत हो गई। इस घटना ने पूरे इलाके में तनाव पैदा कर दिया है। बसपा सुप्रीमो मायावती और सपा अध्यक्ष अखिलेश यादव ने इस घटना को लेकर प्रदेश की कानून व्यवस्था पर गंभीर सवाल खड़े किए हैं, वहीं दलित संगठन आरोपियों की गिरफ्तारी की मांग पर अड़े हैं।













