बिहार विधानसभा चुनाव 2025 के नतीजे लगभग सामने आ चुके हैं, और जाने-माने चुनावी रणनीतिकार एवं जन सुराज के संस्थापक प्रशांत किशोर को अपने पहले चुनाव में करारी नाकामी हाथ लगी है। उनकी पार्टी ‘जन सुराज’ को एक भी सीट हासिल नहीं हुई।
जन सुराज के जिस उम्मीदवार के जीतने के सबसे ज्यादा कयास लगाए जा रहे थे, वह भी बुरी तरह हार गए। कुम्हरार सीट से जन सुराज पार्टी ने मशहूर गणितज्ञ केसी सिन्हा को टिकट दिया था, लेकिन इस सीट पर बीजेपी के संजय कुमार ने उन्हें पटखनी दे दी।
कुम्हरार सीट: 85 हजार से अधिक वोटों से हार
बीजेपी के संजय कुमार ने केसी सिन्हा को 85 हजार 468 वोटों के भारी अंतर से हराया।
- संजय कुमार (बीजेपी): 1 लाख 485 वोट
- केसी सिन्हा (जन सुराज): महज 15 हजार 17 वोट (तीसरे स्थान पर)
- इन्द्रदीप कुमार (कांग्रेस): 52 हजार 961 वोट (दूसरे स्थान पर)
‘अर्श’ नहीं, ‘फर्श’ पर रही जन सुराज
बिहार विधानसभा चुनाव से पहले प्रशांत किशोर ने कई बार कहा था कि उनकी जन सुराज पार्टी ‘अर्श’ पर रहेगी या फर्श पर रहेगी। उनका यह बयान अब उनके लिए कड़वी हकीकत बन गया है।
प्रशांत किशोर ने दो बड़े दावे किए थे:
- जन सुराज “अर्श पर या फ़र्श पर” रहेगी।
- जद (यू) 25 सीटें से ज्यादा नहीं जीतेगी।
जहां नीतीश कुमार की पार्टी को लेकर की गई भविष्यवाणी अभी साफ नहीं है, वहीं किशोर की अपनी पार्टी के लिए राह बेहद कठिन साबित हुई है और अधिकतर सीटों पर जन सुराज प्रत्याशियों की ज़मानत ज़ब्त होती नजर आ रही है।
रणनीति में दक्षता के बावजूद राजनीतिक मंच पर निराशा
लगभग एक साल पहले बिहार भर में महीनों तक चली पदयात्रा के बाद 47 वर्षीय किशोर ने अपनी पार्टी की शुरुआत बड़े जोर-शोर से की थी। भले ही उन्हें पिछले साल लोकसभा चुनाव में भाजपा के 300 पार जाने का गलत अनुमान लगाने के लिए आलोचना झेलनी पड़ी थी, लेकिन उनका यह विश्लेषण कि ‘विपक्ष नहीं, विपक्ष की पार्टियां कमजोर हैं’, भारतीय राजनीति में उनकी गहरी समझ को दर्शाता है।
किशोर की रणनीतिक क्षमता से पहले नरेंद्र मोदी, नीतीश कुमार, ममता बनर्जी, अरविंद केजरीवाल, जगन मोहन रेड्डी, उद्धव ठाकरे और एम.के. स्टालिन जैसे बड़े नेता लाभान्वित हुए हैं, लेकिन बिहार में मिली करारी हार ने उनकी राजनीतिक शुरुआत को झटका दिया है।
नीतीश कुमार से लेकर कांग्रेस तक का सफर
जन सुराज पार्टी किशोर का पहला राजनीतिक मंच नहीं है। चुनावी रणनीति में उनकी दक्षता से प्रभावित होकर नीतीश कुमार ने 2015 में सत्ता में लौटने के बाद उन्हें कैबिनेट मंत्री के बराबर दर्जे के साथ सलाहकार नियुक्त किया था। वह जद (यू) में शामिल होकर पार्टी के राष्ट्रीय उपाध्यक्ष भी बने थे। हालांकि, नागरिकता संशोधन कानून (CAA) पर जद (यू) की अस्पष्ट स्थिति के खिलाफ मुखर होने पर उन्हें एक साल के भीतर ही पार्टी से बाहर कर दिया गया था।
निष्कासन के बाद उनका ‘बात बिहार की’ अभियान भी ठप पड़ गया। ममता बनर्जी के 2021 के चुनाव अभियान को सफलतापूर्वक संभालने के बाद उन्होंने कांग्रेस को पुनर्जीवित करने की योजना भी पेश की थी, लेकिन वह प्रयास भी आगे नहीं बढ़ सका।














