तृणमूल कांग्रेस (TMC) के करीब 20 बागी सांसदों द्वारा अपने गुट का नेशनलिस्ट सिटिजन्स पार्टी ऑफ इंडिया (NCPI) में विलय करने और एनडीए को समर्थन देने की घोषणा के बाद राजनीतिक गलियारों में हलचल तेज हो गई है। इस घटनाक्रम ने न सिर्फ पश्चिम बंगाल की राजनीति को गर्मा दिया है, बल्कि दल-बदल विरोधी कानून को लेकर भी नई बहस छेड़ दी है। अब सवाल उठ रहा है कि क्या तृणमूल कांग्रेस इस कदम के खिलाफ कानूनी लड़ाई लड़ सकती है और बागी सांसदों की सदस्यता पर संकट आ सकता है?
क्या बागी सांसदों को कोर्ट में चुनौती दे सकती है TMC?
भारतीय संविधान के तहत किसी भी राजनीतिक दल को यह अधिकार है कि यदि उसे लगता है कि उसके सांसदों या विधायकों ने दल-बदल विरोधी कानून का उल्लंघन किया है, तो वह उनके खिलाफ कानूनी कार्रवाई की मांग कर सकता है। ऐसे मामलों में पहला कदम आमतौर पर संबंधित सदन के स्पीकर के समक्ष उठाया जाता है।
यदि पार्टी को लगता है कि सांसदों ने पार्टी छोड़कर दूसरे राजनीतिक समूह का समर्थन किया है, तो वह उनकी सदस्यता समाप्त करने की मांग करते हुए अयोग्यता याचिका दाखिल कर सकती है।
बागी सांसदों के खिलाफ पहला कदम क्या होगा?
तृणमूल कांग्रेस लोकसभा स्पीकर के समक्ष दसवीं अनुसूची (Tenth Schedule) के तहत अयोग्यता याचिका दायर कर सकती है। स्पीकर को यह तय करने का अधिकार होता है कि संबंधित सांसदों ने दल-बदल विरोधी प्रावधानों का उल्लंघन किया है या नहीं।
यदि स्पीकर मामले पर फैसला लेने में अत्यधिक देरी करते हैं, तो प्रभावित पक्ष हाई कोर्ट या सुप्रीम कोर्ट का रुख कर सकता है और समयबद्ध निर्णय की मांग कर सकता है।
क्या सिर्फ दो-तिहाई सांसदों का समर्थन काफी है?
अक्सर बागी गुट यह दावा करते हैं कि उनके पास पार्टी के दो-तिहाई सांसदों या विधायकों का समर्थन है, इसलिए उन पर दल-बदल कानून लागू नहीं होना चाहिए। हालांकि मौजूदा संवैधानिक व्यवस्था में सिर्फ संख्या बल पर्याप्त नहीं माना जाता।
91वें संविधान संशोधन के बाद उस प्रावधान को समाप्त कर दिया गया था, जिसके तहत पार्टी के विभाजन के आधार पर सुरक्षा मिल सकती थी। अब केवल यह दावा करना कि बड़ी संख्या में सांसद साथ हैं, अयोग्यता से बचने के लिए पर्याप्त नहीं है।
वैध विलय साबित करना क्यों जरूरी है?
दल-बदल विरोधी कानून के तहत सुरक्षा पाने के लिए बागी गुट को यह साबित करना होगा कि उसका किसी अन्य राजनीतिक दल के साथ वैध और संवैधानिक रूप से मान्य विलय हुआ है।
इसके लिए केवल विलय की घोषणा करना काफी नहीं होता। संबंधित प्रक्रिया को संविधान और कानून में निर्धारित सभी शर्तों को पूरा करना होता है। साथ ही यह भी जरूरी है कि विलय को पर्याप्त समर्थन प्राप्त हो और उसे कानूनी रूप से मान्यता मिलने योग्य माना जाए।
अदालत कब कर सकती है हस्तक्षेप?
हालांकि ऐसे मामलों में शुरुआती फैसला स्पीकर के अधिकार क्षेत्र में आता है, लेकिन कुछ परिस्थितियों में अदालत भी हस्तक्षेप कर सकती है। यदि यह आरोप लगे कि स्पीकर ने पक्षपातपूर्ण रवैया अपनाया, प्राकृतिक न्याय के सिद्धांतों का पालन नहीं किया या बिना उचित कानूनी आधार के किसी गुट को मान्यता दे दी, तो मामला न्यायिक जांच के दायरे में आ सकता है।
इसके अलावा यदि कथित विलय के पीछे वास्तविक संगठनात्मक मंजूरी या वैधानिक प्रक्रिया का पालन नहीं हुआ हो, तब भी अदालत मामले की समीक्षा कर सकती है।
दसवीं अनुसूची के तहत होगी पूरे मामले की परीक्षा
विशेषज्ञों का मानना है कि बागी सांसदों द्वारा दूसरी पार्टी में शामिल होने या विलय का दावा करने भर से उन्हें स्वतः कानूनी सुरक्षा नहीं मिल जाती। पूरे मामले की जांच संविधान की दसवीं अनुसूची के प्रावधानों के तहत होगी और अंतिम निर्णय इस बात पर निर्भर करेगा कि विलय की प्रक्रिया कानूनी कसौटियों पर खरी उतरती है या नहीं।















